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कुंडली- मंगल-शनि की स्थिति, दुर्योग

Posted On: 7 Nov, 2013 ज्योतिष में

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कुंडली- मंगल-शनि की स्थिति, दुर्योग
कुंडली में मंगल-शनि-गुरु की स्थिति अन्य ग्रहो से पृथक होती है. ये सम्पूर्ण कुण्डली को आमूल परिवर्तित कर देने की क्षमता रखते है. चौथे भाव में शनि को नपुंसकत्व एवं अन्य पीड़ा देने वाला बताया गया है. किन्तु वृश्चिक लग्न में यदि चौथे भाव में शनि-मंगल युति हो और इन दोनों में कोई अस्त न हो तो कुंडली के सारे दुर्योग तिरोहित या शक्तिहीन हो जाते है. और मनुष्य राजा होता है. इसी प्रकार गुरु लग्नेश होकर आठवें भाव में उच्चस्थ ही क्यों न हो, यदि मंगल से युत हो तो वह व्यक्ति समस्त दुःख, पीड़ा, हानि एवं कष्ट भोगता है. इसके विपरीत यदि गुरु व्ययेश भी हो किन्तु दशम भाव में उच्चस्थ मंगल के साथ हो तो ऐसा व्यक्ति धन, सम्मान एवं नैरुज्यसब कुछ पा जाता है.
पंडित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
November 13, 2013

पंडित जी मुझे अपने अति संघर्ष मय जीवन का भविष्य जानना है सो कृपया मै कुंडली अपनी और अपने परिवार की भेज सकती हूँ !यदि हाँ तो कैसे और किस पते पर? धन्यवाद !!

    November 13, 2013

    रंजना जी मुझे नहीं मालूम मैं आप को क्या सम्बोधन दूँ. चलिये, यदि छोटी है तो बेटी होंगी, बड़ी होगी तो माँ या बहन होगी। और यदि हमउम्र होगी तो “तथागत” होगी। चूँकि आपने अपने जीवन के एकाँगी एवं एकाकी जीवन का पहलू देखा और सहज ही उसे अति संघर्ष पूर्ण बता दिया। जब कि आप के मनोद्गार को आप की रचना में उदात्त अनुदात्त भेद से मैंने देखा तो आप मनुष्य के सांसारिक जीवन में आने वाली समस्त अनुकूल प्रतिकूल आदि अपेक्षित सम विषम परिस्थिति जन्य मार्ग पर अग्रसर होने वाली लगी. अस्तु, आप जन्म पत्री को निम्न पते पर भेज सकती है- पण्डित आर के राय कनिष्ठ कमीशन्ड अधिकारी 135 (स्वतंत्र) कर्मशाला ई एम् ई (संकेत संवर्ग) द्वारा 56 ए पी ओ विशेष- कृपया हाथ की बनी जन्म पत्री ही भेजें। यदि आप दिल्ली में है तो 17 नवम्बर को मैं दिल्ली में रहूँगा। आप चाहे तो मिल भी सकती है.

November 9, 2013

श्री गर्ग जी, मेरे पास “मंगल यान” भेजने के समय का कोई “विवरण” उपलब्ध नहीं है. इसलिये मैं सम्भवतः आप की इस इच्छा की पूर्ति नहीं कर सकता।

    sanjay kumar garg के द्वारा
    November 13, 2013

    पंडित जी, सादर नमन! “मंगल यान” “६ नवम्बर २०१३” को आंध्रप्रदेश के “श्री हरिकोटा” से “दोपहर २:३८” पर छोड़ा गया था! ये यान मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए भेजा गया है!

sanjay kumar garg के द्वारा
November 9, 2013

पंडित जी, सादर नमन! उत्तर देने के लिए सादर धन्यवाद! पंडित जी “मंगल यान” भेजने के “समय” की “कुंडली” बनाकर उसके भविष्य के बारे में एक आलेख की आपसे आशा करता हूँ! आशा करता हूँ, मेरी आशा जल्द पूरी होगी! धन्यवाद!

November 8, 2013

गर्हिदाचारगल्भभाषणम प्रोषितो परसेवाधर्मः। वृत्तिदम्भभूषितम् जातो मंदो यदि सप्तमे भवेत्। अर्थात अंत्ये (मीन) लग्न में किसी अन्य ग्रह की युतिदृष्टि से रहित मन्द (शनि) सप्तम भाव में हो तो जीवन साथी शिथिल चरित्र वाला, दूसरे की सेवा (नौकरी) करने वाला, निर्धन होकर भी दम्भी तथा जल्पक (मिथ्या भाषी) होते हुए अपने व्यवसाय में सदा ही असफल होता है.

    sanjay kumar garg के द्वारा
    November 13, 2013

    पंडित जी, पुन सादर नमन! मीन लगन में यदि सप्तम में शनि हो. तो वे “व्येश व् आयेश” दोनों होंगे, सप्तम में शनि को क्या “पापी गृह” इनकी “पाप प्रकर्ति” के कारण माना जायेगा या “आयेश” होने के कारण “शुभ गृह” माना जाएगा, पडित जी मैं ज्योतिष का छोटा सा विधार्थी हूँ, कुछ जिज्ञासायों का समाधान चाहता हूँ, मुझे विश्वास है, आप मेरा मार्गदर्शन अवश्य करेंगे!!

    November 13, 2013

    श्री गर्ग जी बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार कि आप भी ज्योतिष महाविज्ञान में रूचि रखते हुए इसकी सतत साधना में रत है. मैंने तो जो कुछ पढना था पढ़ लिया तथा पेट एवं परिवार पालन जैसे अनेकानेक पापपूर्ण कृत्यों पर अवलम्बित तत्सम्बन्धी साधन संसाधन व्यवस्था प्रबंधन में संलग्न हो गया. यद्यपि मैं जैवरसायन (Biochemistry) में स्नातकोत्तर (M. Sc.) की उपाधि से विभूषित हूँ. किन्तु ज्योतिष के मूल ठोस एवं प्रामाणिक वैदिक (न कि भ्रममूलक, निराधार एवं पोंगापंथियों की लकीर फकीरी) से अभिभूत होकर मैंने ज्योतिष का थोड़ा बहुत अध्ययन कर लिया। और सेना की असहज नौकरी करते हुए भी इसके प्रचार प्रसार में अपनी क्षमता के अनुसार प्रयत्नशील हूँ. आप मेरे अन्य लेख भी अवश्य पढ़े होगें। कई पोंगापंथी पापकर्मरत पाखण्डी उदर भरण पोषण में रत दुष्कर्मी तथाकथित पंडितो ने मेरे लेखो पर टीका टिप्पडी की है. किन्तु मुझे इसका कोई मलाल नहीं है. कारण यह है कि मुझे “जजमानी” तो करनी नहीं है. भारत के केंद्र सरकार द्वारा एक निर्धारित मोटी “रकम” हर महीने मुझे वेतन के रूप में प्राप्त हो जाती है. हाँ, इन ज्योतिष के लिए “विष” स्वरुप पंडितो की “जजमानी” पर ज़रूर विपरीत प्रभाव पड़ना शुरू हुआ है. और इनकी “लाबी” में खलबली मची हुई है. खैर इसका कोई प्रभाव मेरे ऊपर नहीं होने वाला। अस्तु, मुख्य विषय पर आते है. एकादशेश एवं व्ययेश तो चाहे नैसर्गिक शुभ ग्रह ही क्यों न हो, सदा ही पापी हो जाते है. किन्तु जहाँ तक शनि का सम्बन्ध है, इसके पापी होने का कारण दूसरा है. सप्तमस्थ शनि की मीन लग्न में वृश्चिक, मीन एवं कर्क राशियों (चतुर्थ, नवम एवं लग्न) पर पूर्ण दृष्टि होगी। मीन लग्न में इन तीनो राशियों की दृष्टि सप्तम एवं अष्टम भाव पर चारो तरफ से उत्कट एवं तिर्यक पड़ती है. “अंत्ये भवे जाया रश्मिपरितः धर्मे सूखेर्कटे सँगसारँग।” परिणाम स्वरुप मीन लग्न में सप्तमस्थ शनि पापी हो जाता है. किन्तु इसके साथ कुछ तथ्यो पर ध्यान रखें- इसका चतुर्थेश के किसी विषम अंश में होना इसे पाप मुक्त कर देगा। लग्नेश यदि कर्क राशि में तथा चन्द्रमा धनु में या मंगल भाग्य में सवर्ण स्थिति में हो तो शनि कभी पापी नहीं हो सकता। यदि किसी भी तरह लग्न एवं सप्तम भाव कृत्यांगी या भावतरी नक्षत्रो में हो तो शनि पापी नहीं हो सकता। यदि जन्म के समय भाव की संध्या दशा में उसी की पाचक दशा एवं भावेश की महादशा एक साथ हो गई हो तो शनि जीवन में हर सुख देने वाला हो जाता है. बुध एकादश भाव में एवं चन्द्र पञ्चम भाव में दशमेश के साथ सम्बन्ध बना रहे हो तो शनि कभी पाप फल नहीं दे सकता। शर्त यह है कि गुरु को किसी भी स्थिति में शुक्र से दूना षड्बल प्राप्त हो रहा हो. यदि षड्वर्ग में कन्या राशि को 28 से ज्यादा अंक मिल रहे हो तो शनि सप्तम भाव में कभी पापी नहीं हो सकता। ये कुछ मुख्य तथ्य है जो शनि के सप्तम कृत पाप पूर्ण प्रभाव को निर्मूल करते है.

    sanjay kumar garg के द्वारा
    November 14, 2013

    पडित जी, सादर प्रणाम! पंडित जी मैंने कही पर राशियों कि दृष्टि के बारे में पढ़ा ही नहीं है, केवल गृहों कि द्रिष्टि के बारे में पढ़ा है. आप मुझे इस किताब या ग्रन्थ का नाम बताइये, ताकि मैं इसको पढ़कर कुछ ज्ञान में इजाफा का सकूँ, पंडित जी इक प्र्शन और “चन्द्र” कब पापी होते है? क्या “सूर्य” के साथ युति-द्रस्ट होने पर ही पापी होते है, या किसी भी “भाव” में बैठकर, यदि इनके अंश, सूर्य के अंश के निकट हों तब भी ये पापी हो सकते हैं? इसका जातक पर क्या प्रभाव होता है? इसके लिए क्या उपाय करने चाहिए? पडित जी, बहुत जिज्ञासाएं है, परन्तु समाधान करने वाला कोइ नहीं है, शायद ईश्वर ने मेरा योग आपसे, मेरी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए कराया हो!! पडित जी जल्दी नहीं है, जब समय मिले मेरे प्रश्नों का उत्तर दे देना, क्योंकि दूसरी जिज्ञासा तैयार है! धन्यववाद पंडित जी!!!

sanjay kumar garg के द्वारा
November 8, 2013

पंडित जी, सादर नमन! मीन लगन में यदि सप्तम में शनि हो, तो क्या प्रभाव होगा? अवश्य जवाब दीजिये पंडित जी

November 14, 2013

इसके लिये आप चौखम्भा प्रकाशन या कचौड़ी गली वाराणसी से या बाम्बे मुद्रणालय मुम्बई से प्रकाशित एवं डॉ सुरेश चन्द्र मिश्र द्वारा टीकाकृत महर्षि पाराशर का पाराशर संहिता, पाराशर होरा शास्त्र, रंजन पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित आचार्य वराह कृत वृहज्जातकम्, तथा डॉ माधव मुकुंद की टीकाकृत सूर्य संहिता का अध्ययन करें। पुनः शरीर संरचना एवं ग्रह प्रभाग के लिये कुमार तरंगिणी, जीवनिकायम एवं आयुर्वल्लभ आदि पुस्तको का अध्ययन करें। आगे- क्षीणश्चंद्रो रवीरभौमः पापो राहुश्शनिः शिखी। बुधो अपि तैर्युतो पापो होरा राश्यार्ध उच्यते। हीनकिरण (कृष्णपक्षीय), हतकिरण (सूर्य से अस्त), दंशकिरण (युद्ध पराजित), विषकिरण (छठे, आठवें या बारहवें भाव के स्वामी), अघोरकिरण (आगे पीछे कोई ग्रह न) होने पर चन्द्रमा पापी हो जाता है. किन्तु- कृष्ण पक्षे दिवा जातः शुक्ल पक्षे यदा निशि। शष्टाष्टम् गतो चन्द्रः मातरेव परिपालयेत्। कृष्ण पक्ष में दिन में जन्म हो या शुक्ल पक्ष में रात में जन्म हो और चन्द्रमा छठे या आठवें भाव में ही क्यों न हो, वह चन्द्रमा माता के समान पालन करता है. आप ने सही कहा. सैन्य जीवन में समय निकाल पाना बहुत दुष्कर कार्य है. फिर भी मैं कोशिश करता हूँ, शीघ्र से शीघ्र प्रत्येक जिज्ञासु का उत्तर दे सकूँ। धन्यवाद।


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