वेद विज्ञान

वेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

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मंगल यंत्र-विज्ञान प्रमाणित

Posted On: 27 Jan, 2014 ज्योतिष में

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=======मंगल यंत्र======

विपुल जी===
आप का प्रश्न सम्भवतः और लोगो के लिये भी लाभ कारी उत्तर वाला होगा इसीलिये मैं इसका स्पष्टीकरण अपने पोस्ट पर कर रहा हूँ.=
सबसे पहले आप अपने जन्म नक्षत्र का वर्गीकरण करें। अर्थात प्रथम 9 नक्षत्रो में है तो प्रथम त्रिपाद, 10वें से लेकर 18वे तक दूसरा त्रिपाद तथा 19वे से 27वे नक्षत्र तक तीसरा त्रिपाद। जैसे यदि जन्म नक्षत्र अनुराधा है तो यह दूसरा त्रिपाद होगा। यह नक्षत्र दूसरे त्रिपाद की आठवी नक्षत्र है. इस प्रकार आठ रत्ती का मंगोलियाई मूँगा लेवें। उसके बाद उसे अनुराधा के निर्धारित रस नागरस में डालें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजपत्र या ताम्रपत्र या रजतपत्र पर अनुराधा नक्षत्र का मन्त्र “ॐ वृहदोद्रेकम्भोजा रदन्ति व्यहोपाय मेदिन्याम ॐ.” या फिर वेदिक मन्त्र “ॐ अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्यां अपां रेतां सि जिन्वति” या तांत्रिक मन्त्र “ॐ अँ अँगारकाय नमः” लिखें। वेदिक या तांत्रिक मन्त्र लिखते समय वेदिक स्वरो के प्रत्यारोपण हेतु वेदाङ्गी पण्डित से संपर्क करना पडेगा। उसके बाद उस पर मूँगे को रखें। दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिने हाथ की कनिष्ठिका (Small) अंगुली को स्पर्श करते हुए उस मूँगे को ढक कर उस पर लिखे मन्त्र का 108 बार पाठ करें। प्रत्येक मन्त्र को पढने के बाद उस मूँगे पर फूँक मारें। उसके बाद उस मूँगे को उठा लें. तथा उस मन्त्र लिखे यन्त्र को शहद एवं कपूर मिश्रित लेप को रुई पर लगाकर उसे जलाकर दिखायें। फिर श्रवणा सफ़ेद, गेरुई हल्दी, कपरपाती एवं चकरौता एक एक माशा मिलाकर घर, दुकान, मकान या जिस जगह लगाना हो वहाँ पश्चिम या दक्षिण की दीवार पर उतनी ही लम्बाई चौड़ाई में लेप लगायें जितना चौड़ा वह पत्र हो. फिर उस पर चिपका दें. मूँगे को अपनी शक्ति के अनुसार सोने चाँदी आदि में मंढ़वाकर दाहिने हाथ की उस अँगुली में पहने जिसमें शँख का निशान हो या फिर तर्जनी ऊँगली में धारण करें।
ध्यान रहे नागरस अमोनियम ट्राईसल्फाइड बोरैक्सोनेट होता है जब कि नागबेल का रस बेरियम हाइड्रोफास्फाइड ट्रेंकोरेट होता है. तथा श्रवणा सफ़ेद लेनोसिन फ्रेक्सोरस मोनोक्लोराइड होता है. बोरैक्सोनेट एवं फ्रेक्सोक्लोराइड वलयचक्र बनाकर मूँगा (बोराइकोनेट कार्बाइड) के चारो तरफ घूमता रहता है जब कि ट्रेनकोर्ट बेरियम फास्फाइड बचाव वाले प्रकाश पुँज के वलय को छिन्न भिन्न कर देता है. इसलिये द्रव पदार्थो को ग्रहण करते समय सावधानी बरतें।
====यह एक अनुभूत तथा प्रामाणिक प्रयोग है===

पण्डित आर के राय

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
January 27, 2014

Jitendra Kumar Mishra प्रणाम सर। अगर लग्न कुंडली मेँ गुरु द्वादश मेँ कर्क राशि में हो तथा तृतीय भावस्थ मंगल और शुक्र से दृष्ट हो तो क्या फल होता है। कृपया समाधान करेँ। गुरु बारहवें कर्क राशि में है. तथा तीसरे मंगल शुक्र है. और आप ने कहा है कि इस गुरु को मंगल और शुक्र देख रहे है—- अब मैं सब ऋषियों एवं आर्ष मत का यहाँ उल्लेख न कर के सर्व विदित एवं आज कल के ज्योतिषियों के जीने खाने के प्राणाधार महर्षि पाराशर का ही उल्लेख करता हूँ ——- “ग्रहास्त्र्यन्शम त्रिकोणं च चतुरस्रं तु सप्तमम्। पश्यन्ति पादसमवृद्धया फलदाश्च तथैव ते.. पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनि-जीव-कुजाः पुनः। विशेषतश्च त्रिदश-त्रिकोण-चतुरष्टमान।। (बृहत् पाराशर होराशास्त्र अध्याय 27 श्लोक 2 एवं 3) अर्थात सभी ग्रह त्र्यंश (3/10), त्रिकोण (9/5), चतुरस्र (4/8) एवं सप्तम को चरणवृद्धि से देखते है. और तदनुसार ही फल देते है. सप्तम को सभी ग्रह देखते है. किन्तु शनि-जीव (गुरु) तथा कुज (मंगल) की पृथक विशेष दृष्टि होती है. ये क्रमशः त्रिदश, त्रिकोण एवं चतुरष्ट को पूर्ण दृष्टि से देखते है. आगे———- “एवं सामान्यतो दृष्टिसाधनाय विधिः स्मृतः। मन्दक्षितिज-जीवानां दृष्टौ बोध्या विशेषता।” (बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् अध्याय 27 श्लोक अर्थ स्पष्ट है. शनि मंगल एवं गुरु की विशेष दृष्टि होती है. अर्थात उनकी सामान्य दृष्टि से कोई संलग्नता नहीं। ———-यह तो रहा हमारे ऋषि का मत.—– आगे देखें यवनाचार्य का मत—– “तुङ्गस्थे खेटाश्चसौम्या रिष्फगे वा षडाष्टगे। रिपु संयुते अपि वा खेटा दृष्टि भेदं विनश्यति।” (वृद्ध जातकाख्यानम अध्याय 46 श्लोक 34) अर्थात यदि शुभ ग्रह आठवें, छठे बारहवें उच्चस्थ है या कोई ग्रह अपने शत्रु के साथ युति बनाया है तो उसकी सामान्य दृष्टि भंग हो जाती है. आप के प्रश्न में भी यही स्थिति है——–गुरु बारहवें उच्चस्थ है. तथा शुभ ग्रह शुक्र अपने शत्रु ग्रह मंगल से युक्त है. फिर इनकी स्वाभाविक दृष्टि कहाँ? —————-मिश्र जी, आप की जिज्ञाषा सम्भवतः शांत हो गई होगी। किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है. आप ने जहाँ यह पढ़ा कि आप के द्वारा प्रश्न में उल्लिखित ग्रहो की दशम दृष्टि होती है वहाँ पर इसका फल भी दिया है. फिर मुझसे इसका फल पूछने का क्या तात्पर्य? अर्थात आप मेरी परीक्षा लेना चाहते है. कोई बात नहीं आगे से ख़याल रखूंगा। मुझे ऐसे प्रश्न या परीक्षा में न तो कोई रूचि है और न ही इसकी आवश्यकता। मैं ऐसे प्रश्नो का उत्तर नहीं दे पाउँगा। पंडित जी! प्रणाम! १२ वे गुरू को मंगल व् शुक्र तीसरे से केसे देख रहें हैं? क्या तृतीय मेष राशि की दृष्टि से देख रहें हैं? सामने द्र्ष्टि से तात्पर्य क्या केवल सातवीं दृष्टि से है, या उन ‘गृह विशेष’ की ‘विशेष दृष्टि’ 3-7,4-8,5-9 से भी हैं? पंडित जी कृपया मार्गदर्शन अवश्य कियिए, मुझे आपसे ही उम्मीद रहती है!

sanjay kumar garg के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीय पंडित जी, सादर नमन! महर्षि पराशर के दीर्घायू योग (३२) के श्लोक “लग्नेश व् अष्टमेश दोनों चर में हो, अथवा ये दोनों स्थिर या दिस्वभाव में हो तो दीर्घायू योग होता है” पंडित जी! स्थिर-दिस्वभाव में लग्नेश को माने या अष्टमेश को, या फिर लग्नेश-अष्टमेश दोनों ही ‘स्थिर’ या ‘दिस्वभाव’ किसी ‘एक’ ही भाव में ‘दोनों’ बेठे तब दीर्घयाओं योग माने? अल्पायु व् मध् आयु के सम्बन्ध में भी यही शंका है, कृपया मार्गदर्शन करें पंडित जी!

    January 27, 2014

    श्री भार्गव जी कृपया महर्षि पाराशर के श्लोको का अन्वय (Ordering) कर के पढ़े तो मेरी समझ से उसका विश्लेषण आसान होगा। =====”अध्यश्रुत चतुरस्र चरादृद्भावा”=== लग्नेश के साथ अष्टमेश यदि चर राशि में वृद्धि क्रम में होगा ===श्लोक पर ध्यान दें==यागणाद्यत्यु लघुत्तमः=== छन्द रचना के अनुसार चरादि गणो की अनु, वय, साम के अनुसार अग्रसारण हो रहा है===अतः यदि लग्नेश आरोही अर्थात अपने नीच को लाँघ कर आगे जा रहा हो तथा अष्टमेश अपने उच्च का संक्रमण कर अवरोही हो तब दीर्घायु योग होगा। वैसे महर्षि पाराशर इस सम्बन्ध में द्विस्वभाव राशि को प्राथमिकता देते है, जैसा कि उन्होंने “प्रकारान्त्ये भूतस्त्वाम तदनुलये गृह्यताम्” कह कर इसका समापन किया है.


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