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वास्तु का पराजैविक दोष

Posted On: 16 Feb, 2014 ज्योतिष में

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====वास्तु का पराजैविक दोष====
यदि आवास किसी भी तरह पूर्ण या आंशिक रूप से सूर्यवेध के प्रभाव में हो तथा अग्नि या ईशान कोण में इंद्र या अग्नि का विपर्यय हो तो परिवार में आचरण सम्बन्धी प्रदूषण या पुरुष औरत व्यभिचारी हो जाते है. यदि प्रातः काल में आवास का उत्तरी भाग जल का निषेध स्वरुप प्रदर्शित करता हो तथा सूर्यास्त के समय घर का पश्चिमी भाग प्रधूलि स्वरुप प्रदर्शित करता हो तो घर में से लक्ष्मी का पलायन घर में प्रवेश के आठवें वर्ष में पूर्ण रूप से हो जाता है. इन दोनों दोषो को पराजैविक दोष कहते है.
लघु प्रासादिक आवास—-=====
यदि घर का उत्तरी हिस्सा प्रत्येक माह में चन्द्र का शर अपने विपरीत दिखाता है तथा वास्तु देव का वाम अंग निकास से लघु कोण बनाता हो तो घर में सुख शान्ति स्थाई रहती है. यदि आवास का प्रथम ऊर्ध्वायत वल्ली पश्चिम दिशा से ज्यादा पास हो किन्तु दक्षिण दिशा से किसी भी तरह ऊर्ध्वावनत निर्मित हो तो घर में नित्य नए कलह उत्पन्न होते है. किन्तु यदि यही वल्ली पूर्वापर समानांतर एवं उत्तर से दक्षिण प्रत्येक कोण से अधिक कोण न बनाता हो तो संतान यशस्वी होती है.
यदि घर किसी भी तरह ऐजया या निर्सरिक अर्थात उत्तर से दक्षिण विविध स्थानायाम् या रुकावट करता है अर्थात ज्यादा कुछ ऐसा निर्माण है जिससे ज्यादा रुकना पड़ता हो तो असामयिक मृत्यु अपना स्थान बना लेती है. और यदि यही निर्सरिक दोष दाहिने या बायें से व्यवधान बनाते हो तो यश एवं व्यवसाय नित्य द्वितीया के चन्द्रमा की तरह बढ़ते है.
यदि अवर्हण (ज्येष्ठ, भाद्रपद, मार्गशीर्ष एवं फाल्गुन महीने में संध्या के समय दक्षिण दिशा में उदित होने वाले प्रथम चमकीले तारे से आवास के ऊपरी उठे हुए किसी हिस्से से आवास के सम्मुख परछाही पड़ती हो तो वह घर यमराज का आवास बन जाता है.
यदि इसी तारे से घर के पूर्व दिशा में परछाई की आभा जैसी दिखाई दे तो ऐसे घर में कोई दोष प्रवेश नहीं कर पाता है. ये ऊपर के दोष लघुप्रासादिक दोष कहलाते है.
प्रकल्प वास्तु दोष=====
यदि घर के बीच की कच्ची जमीन को थोड़ा खोद कर निकाली गई मिटटी फिटकरी, नौसादर एवं चूना के घोल में डालने पर बदबू देने लगे तो घर की वास्तु शान्ति तत्काल करवायें। जब ऐसा महसूस हो कि घर में कुछ अनपेक्षित घटनाक्रम जन्म ले रहा हो तो इस प्रकार मिट्टी का परिक्षण (Soil Test) कर के विधान पूर्वक शान्ति करवायें। इसका विधान महर्षि पाराशर  अपनी संहिता में विस्तृत रूप से बताया है.
यदि उपरोक्त प्रकार से गंध न निकले किन्तु घर में घटनाएँ हो रही हो तो घर के दक्षिण एवं पश्चिम हिस्से के बाहरी एवं भीतरी भाग की थोड़ी थोड़ी मिट्टी कज्जलपेठ (बेरियम फास्फाइड), नवजल्पिका (नियोफिलिक एसिड) एवं पारुल लवंग के मिश्रण का पानी के साथ घोल बनाकर उसमें डाल कर हिलाएँ। यदि उसमें से वाष्प निकलने लगे तो आवास में निर्धारित स्थान से थोड़ा पूर्व हटकर इंद्रकलश की स्थापना कर वहाँ पर 21 दिनों तक घी में शहद मिलाकर दीप जलायें।
यदि घर में प्रवेश करते समय दाहिने का दरवाजा उस दिशा में प्रायः गमन करता है जिस दिशा के विपरीत कोण से वायु प्रवाह का आभास होता है तो घर से नित्य दुःख दारिद्र्य पलायित होते रहते है. इसके विपरीत यदि समान दिशा से वायु प्रवाह हो तो घर की सुख शान्ति वायु के साथ बाएबाहर चली जाती है. इसी प्रकार यदि पाकशाला के दरवाजे से वायु बहुधा पूर्व की तरफ प्रवाहित होती प्रतीत होती हो तो नैरुज्य एवं उन्नति मिलती है किन्तु यदि उत्तर दिशा में प्रवाहित होती प्रतीत हो तो अग्निकाण्ड या जलोत्सर्जित दुर्घटना होती है. इन दोषो को प्राणयुज दोष कहते है.
यदि घर में आँगन हो तो प्रवेश द्वार से आँगन का पूर्वी हिस्सा मध्याह्न के सूर्य से क्षितिज के कोण से कम अंशो का अवनयन कोण बनाता हो तो परिवार के सदस्य स्वेच्छाचारी या स्वच्छंद होते है. यदि क्षितिज की ऐसी अवस्था में अवनयन कोण अधिक अंशो में हो तो परिवार में अनुशासन एवं मान मर्यादा का भरपूर सम्मान होता है. ऐसे दोष को विरार्जव कहते है.
मध्याह्न काल में अर्थात अभिजीत मुहूर्त में अपनी पूरी लम्बाई का डण्डा कही मैदान में गाड़ दें. ध्यान रहे डण्डा अपनी पूरी लम्बाई से चार छह अंगुल बड़ा होवे। ताकि लम्बाई से अधिक का हिस्सा ज़मीन में गड़ जाय. उसके बाद उससे पड़ने वाली परछाई को माप लें. ध्यान रहे मध्याह्न काल में परछाई ज़मीन पर नहीं पड़ती है. किन्तु अभिजीत मुहूर्त के अंतिम पल तक प्रतीक्षा करें। उसके बाद किसी भी पूर्णिमा के दिन मध्य रात्रि में इसी तरह लम्बाई ज्ञात करें। दोनों का योग करें। यदि घर में आँगन या किसी अन्य मार्ग से आने वाली सूर्य की किरण उस सँख्या के समतुल्य पल से कम समय तक रहती है तो अपनी भलाई चाहने वाले ऐसे मनुष्य को तत्काल उस आवास में निवास का परित्याग कर देना चाहिये। इसे धुंधुक दोष कहा गया है.
उपर्युक्त दोषो का परिहार एवं मार्जन विविध ग्रंथो में वर्णित है जिसका अनुपालन करना आवश्यक होता है.
पण्डित आर के राय

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
February 18, 2014

पंडित जी, सादर नमन! उच्च स्तरीय संस्कृत निष्ठ भाषा के कारण आपके ज्ञान वर्धक ब्लॉग समझ में कम आ पाते हैं! यदि पंडित जी! आप ब्लॉग की भाषा थोड़ी सी सरल कर दें व् ब्लॉग का विस्तार कर दें, तो मेरे जेसे बहुतों का भला हो जायेगा! आपके ज्ञान रुपी प्रकाश से हम भी थोडा सा ज्ञान प्राप्त कर सकतें हैं! धन्यवाद! पंडित जी!


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