वेद विज्ञान

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अनिषर्ग योग

Posted On: 17 Feb, 2014 ज्योतिष में

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अनिषर्ग योग
यह योग मात्र आवास से ही सम्बंधित नहीं है. बल्कि यह ग्रह दोष भी है. यह ऐसा दोष है जो पहले शुरू में प्रयत्न को सफलता पूर्वक आगे बढ़ाता है. और जब फल मिलना नज़दीक होता है तब सब काम उलट जाता है. और काम बनते बनते बिगड़ जाता है. आदमी को अब बिलकुल विश्वास हो जाता है कि उसका काम या उसकी योजना पूरी हो गई. किन्तु अचानक सब उलटा हो जाता है.
कुण्डली में जब सप्तमेश सप्तमांश कुण्डली में अपने पिछले भावो के उन ग्रहो से जो पृष्टोदयी राशि में स्थित हो और उनसे सप्तमेश अतिक्रमित हो जाये तब यह दोष विवाह तथा संतान सम्बन्धी उपद्रव देता है. अर्थात विवाह तय हो जाता है. और सब कुछ होने के बाद अचानक टूट जाता है.
या फिर स्त्री को गर्भ धारण के चौथे या पांचवें माह में गर्भनाश का सामना करना पड़ता है.
इसी प्रकार जब दशमेश दशमांश कुण्डली में अपने से पीछे पृष्टोदयी राशि में स्थित ग्रहो से अतिक्रमित होता है तो परीक्षा या प्रतियोगिता या नौकरी में सब प्रश्नो का उत्तर सही देने के बाद भी किसी न किसी कारण से हतोत्साहित परिणाम का सामना करना पड़ता है.
आवास के सम्बन्ध में जब अवास की बाह्य परिधि पर शयनकक्ष एवं पाकशाला के द्वारा बनाई गई जीवा (वृत्त खण्ड या चाप) पर कोई भी कोण समकोण से अधिक न बने तो उपर्युक्त दोष उत्पन्न होता है.
इसके निराकरण की विधियाँ विविध ग्रंथो जैसे अहनिदाह, निदान भाष्कर (आचार्य देवपाणि कृत) आदि में श्रम पूर्वक खोजा जा सकता है.
पण्डित आर के राय
Mail-khojiduniya@gmail.com

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 24, 2014

आदरणीय पंडित जी ,प्रणाम आपने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया और विस्तार से बात समझाई उसके लिए मै अनुग्रहीत हूँ ,सादर धन्यवाद .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 19, 2014

पंडितजी -प्रणाम ,आपके लेख से कुछ बातें हमे स्पष्ट नही समझ में आ रही ,अगर विस्तार से बतायें  तो कृपा होगी ,जैसे प्रष्टो दई राशि ,और ग्रहों से अतिक्रमित . सादर आभार

    February 19, 2014

    सुश्री निर्मला सिंह जी राशियाँ तीन तरह की होती है ==पृष्टोदयी, शीर्षोदयी एवं उभयोदयी ====अर्थात जिस राशि का उदय पीठ की तरफ से या पीछे से होता है उसे पृष्टोदयी कहते है. जैसे मकर राशि, जिस राशि का उदय सिर की तरफ से या सामने से होता है उसे शीर्षोदयी कहते है जैसे मीन राशि तथा जिस राशि का उदय दोनों तरफ से अर्थात स्थिति के अनुसार होता है उसे उभयोदयी कहते है. इसका विस्तृत वर्णन संहिता ग्रंथो में सहज ही उपलब्ध है. ======पुनः अतिक्रमण का तात्पर्य है Supersede करना। अर्थात शुरू में पीछे हो और शीघ्रता पूर्वक चलकर अपने आगे वाले को छोड़ कर आगे निकल जाना। मैंने इससे सम्बंधित कई पोस्ट फेसबुक पर लिखा है. यदि उचित एवं आवश्यक समझें तो निम्न link पर देख सकती है. facebook.com/vedvigyan

sanjay kumar garg के द्वारा
February 18, 2014

आदरणीय पंडित जी! सादर नमन! ज्ञान वर्धक ब्लॉग परन्तु पंडित जी! थोडा सा विस्तार दे दें तो हम जेसे अज्ञानी भी समझ जाएँ “पिछले भावो के उन ग्रहो से जो पृष्टोदयी राशि में स्थित हो और उनसे सप्तमेश अतिक्रमित हो जाये?” पंडित जी, कोइ उद्हारण देकर समझ दीजिये, मेरे जेसे अनेकों का मार्गदर्शन हो जायेगा!


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