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जानवरो के बाल (रोम), नख एवं उनका तान्त्रिक उपयोग

Posted On: 22 Feb, 2014 ज्योतिष में

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जानवरो के बाल (रोम), नख एवं उनका तान्त्रिक उपयोग
यद्यपि किसी भी हिन्दू आर्ष ग्रन्थ में इन सबके बारे में मैं कही नहीं पढ़ा हूँ. इन सबका उल्लेख यवन, कार्तकेक (रहस्य कापालिक), अयाजुर (दक्षिणावर्ती =मिश्र आदि देश के साहित्य), उपरितर (चीन देश के साहित्य) तथा मन्युगुलिक (मंगोलियन साहित्य) के यंत्र तंत्र आदि से सम्बंधित ग्रंथो में यत्र तत्र प्राप्त होते है.
भालू के रोम को जादू टोना आदि निवारण में प्रयोग किया जाता है. इसका अंधानुकरण इस कदर गहराई तक जा चुका है कि इसके मूल तथ्य या रहस्य तक जाने की लोग आवश्यकता ही नहीं समझते है.
ड्यूरंकुला (दरुद कन्दरा) में रहने वाले भालू एक पृथक प्रजाति के होते है. इनका रँग लाल होता है. इनके शरीर का रोम कठोर, सीधा खड़ा एवं साही के कांटे की तरह नुकीला होता है. ये भालू इन्हीं बालो की सहायता से अपने से बलशाली हिंसक जानवरो से अपनी रक्षा करते तथा अपनी कंदराओं के विवर को चौड़ा करते है. इन भालुओं में जो मादायें (Female) होती है उनके रोम कठोर नहीं बल्कि मुलायम होते है. किन्तु लम्बे होते है. इन बालो की ये मादायें बड़ी सेवा एवं देखभाल करती हैं. ये मादायें जब अपने बच्चो को दूध पिलाना शुरू करती है तो इन रोमो से एक तरह का लसलसा द्रव निकलना शुरू हो जाता है. जिसे नर (Male) भालू बड़े प्रेम से चाटता है. और मादा भालू के शरीर को साफ़ कर देता है. प्राचीन आयाजुर कहावत के अनुसार एक महात्मा (जिसे इनकी भाषा में भद्रोच कहा जाता है) ने इसका पहली बार प्रयोग किया था. किसी शाही खानदान के एक व्यक्ति को किसी महिला ने कुछ खिला दिया जिससे वह व्यक्ति अर्द्धविक्षिप्त हो गया. उस महात्मा ने इसी मादा भालू के रोम का अतित्राण (परोर कर) कर उस व्यक्ति के गले में बाँध दिया। उस व्यक्ति का खाया हुआ वह पदार्थ मुँह के रास्ते बाहर हो गया. कहते है तब से भालू के रोम का प्रयोग ऐसे जादू टोना के परिप्रेक्ष्य में किया जाने लगा. ====महात्मा जी की बात या ज्ञान तो मैं नहीं जानता। किन्तु मेरे संज्ञान में यह तथ्य सामने आया है कि जिस भालू के बाल में “हेप्टालिथोसिन थायलॉन्साइड” और “सेफ्रोसेटामाइड लिनोजाल” पाया जाता होगा उसका रोम एवं नख (Nail) निश्चित रूप से अवधूतक होता होगा। क्योकि उपर्युक्त दोनों पदार्थ रक्तविषाक्तता (Envenom) को सम्पूर्ण रूप से बाहर कर देते है. किन्तु यह प्रत्येक भालू के साथ नहीं होता है. हमारे देश भारत में यह कुशतृणावर्त (वर्त्तमान कुशतुनतुनिया) से प्रचलन में आया.
सच्चाई पता नहीं क्या है, किन्तु यवनो के मतानुसार कंदहार (वर्त्तमान कांधार) नरेश की राजकन्या जिसका नाम “कंदर्पिका” था इसके लालारस का प्रयोग अपनी आँखों में सुरमा की तरह करती थी तथा इसकी आँखों के किरणो की वेधन क्षमता इतनी उग्र होती थी कि अपनी आँखों की पलको को गिराकर अर्थात आँखों को बंद कर के भी सब कुछ देख लेती थी. यवन लोग सम्भवतः गान्धारी को ही कंदर्पिका कहते है. सच्चाई रहस्य के गर्त में है.
कहने का तात्पर्य यह कि इसका अंधानुकरण इतना बढ़ गया है कि गाँवों में मदारी दिखाने वाले जो भालू लेकर घूमते है लोग उनसे बालो को लेकर जादू टोना दूर करने का काम करते है.
=====इसी प्रकार घोड़े की नाल (Horse Shoe) के बारे में भी है. ऋषि कम्बुग्रीव की तपोभूमि कंबुजसर (वर्त्तमान काबुल) और कश्यप ऋषि की तपोभूमि कश्यपसर (वर्त्तमान काश्मीर) के मध्य सम्वर्तिका कन्दरा (वर्त्तमान स्वात घाटी जो पाकिस्तान में है) से रास्ता अक्षयवर कोटि (वर्त्तमान खैबर दर्रा) तक जाता था. जिसमें आज भी तालीस करंदुसा (सेरेलियम मिश्रित अभ्रक {माइका} अयस्क) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. जिसे किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र से युक्त उपकरण से ही अलग कर एकत्र किया जा सकता है.
===यह विज्ञान सिद्ध है कि डाईथिल फेरमाजाईन सल्फेट जब अभ्रक मिश्रित लौह अयन से भौतिक या रासायनिक क्रिया करता है तो फेरोकिल आर्च या Reflection Arch संवेदना वाही नलिका को Stimulated कर देता है. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास अभी यह फेरामाजाईन के रूप में नहीं बल्कि कारबामाजाईन सल्फेट के रूप में उपलब्ध है जिसका प्रयोग आधुनिक चिकित्सा विज्ञान केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nerves System) के प्रसारण (Stimulating) के लिये करता है. किसी औषधि या विष या विकिरण से प्रभावित व्यक्ति या स्थान को निरापद बनाने में तथा हाइड्रो सोनोडियाम (सम्भवतः आधुनिक विज्ञान इसे इसी नाम से जानता है) का किरण युक्त वायु वलय चारो तरफ उत्पन्न करने में यह सक्षम होता है. किन्तु यह कारबामाजाईन नहीं बल्कि फेरामाजाइन सल्फेट होना चाहिये।
स्वात घाटी में आज भी घुड़ दौड़ कराकर घोड़ो की नाल निकाल ली जाती है. क्योकि इन घोड़ो के दौड़ने से इनकी नाल में घर्षण विद्युत् के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र ढेर सारा अयस्क अपने साथ अवशोषित कर लेता है. और स्थानीय लोग इसका निरापद उपयोग करते है.
इसी प्रकार इन विविध तंत्रात्मक उपस्करों का विवरण यत्र तत्र मिल जाता है जो बहुत उपयोगी है. किन्तु अब गाँव में पालतू घोड़े की नाल कितनी प्रभावशाली एवं उपयोगी है, उसके बारे में मैं कोई टिप्पड़ी नहीं कर सकता।
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
February 24, 2014

आदरणीय पंडित जी, सादर प्रणाम! अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद!


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