वेद विज्ञान

वेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

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सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै

Posted On: 24 Feb, 2014 Others,social issues में

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++++++++++सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै+++++++++
आठो सिद्धियाँ हमारे सामने है. नवो निधियाँ हमारे पास है. किन्तु घोर पापी कलियुग के कठिन दुष्प्रभाव ने हमारी बुद्धि कुण्ठित कर दी है. हमारी आँखों पर लोभ एवं अहंकार का काला पर्दा डाल दिया है. हमारी मति मारी गई है. हमारी हाल उस रोगी जैसी हो गई है जो कड़वा लगने के कारण प्राण रक्षक तीखी औषधि खाता नहीं और फेंक देता है. हमने अपने मन को व्यसन वासना का गुलाम बना दिया है. अनुभवी, बुज़ुर्ग एवं संत महात्माओं द्वारा बताया मार्ग हमें बेकार एवं समय नष्ट करने वाला मूर्खता पूर्ण आचरण लगता है. परम्परा एवं रिवाज़ हमें अपनी सुख और प्रसन्नता में बाधक लगते है. छिछोरी हरकतें नए ज़माने की उच्च सभ्यता का एक आवश्यक अंग मानते है. पूजन, जप, तप, योग अनुष्ठान्न आदि हमें निठल्लो एवं आलसियो का पाखण्ड मानते है. औरतो का कामुक अंगो का प्रदर्शन तथा काम वासना का भड़काना, खुले आम कामुक अंगो का चुम्बन, विविध कामुक मुद्राओं का नग्न प्रदर्शन को Sexual Awareness का नाम देकर इसे शिक्षा का आवश्यक अंग बनाना हम उच्च शिक्षा का लक्षण मानते है. और अब इस Sexual awareness की आड़ में Juvenile Delinquency को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर इससे Sexual अनुभव प्राप्त कर इसके हानि लाभ को सबको प्राप्त करना चाहिये, इसके औचित्य को स्थापित किया जा रहा है. ताकि भविष्य में किसी बलात्कार को अपराध नहीं बल्कि यौन सम्बन्ध के अनुभव का नाम दिया जा सके.
पश्चिम के देशो में अंग प्रदर्शन या आलिंगन या चुम्बन काम वासना को नहीं भड़काता। कारण यह है कि यहाँ का तापक्रम इतना कम होता है कि समस्त सम्बंधित इन्द्रियाँ, ग्रंथियाँ या सम्वेदना वाही तन्तु संकुचित एवं निष्क्रिय अवस्था में पड़े होते है. जिसके परिणाम स्वरूप इनमें इन कामुक अंगो के प्रदर्शन, चुम्बन, मर्दन या आलिंगन से सहज काम वासना जागृत ही नहीं हो पाती। अतः वहाँ के लिये ऐसे पहनावे या आचरण स्वाभाविक है. किन्तु ऊष्ण कटिबंधीय देशो में ये समस्त संवेदना वाही तंतु पसारित (Stimulated) एवं त्वरित क्रियाशील होते है. जिससे ऐसी वासनाओं का भड़काना सरल होता है. हम देख सकते है, समस्त एशिया एवं अफ्रिका महाद्वीप इस व्याधि से आज बहुत ज्यादा पीड़ित है.
यह हमारी संवेदना तंतुओं की तीव्र सक्रियता एवं शीघ्र क्रियाशीलता ही है कि हम आध्यात्मिक ज्ञान, शिक्षा, अनुभव एवं लौकिक तथा पारलौकिक सुख के सम्बन्ध में विश्व का सिरमौर माने जाते है. सम्भवतः इस सम्बन्ध में केवल ”स्वामी विवेकानंद” का नाम उद्धृत करना ही पर्याप्त होगा।
आज हम इन संवेदना ग्राही तंतुओंका इस्तेमाल “काम शिक्षा” के विकाश के लिये कर रहे है. इसे अवनति एवं विनाश का ठोस लक्षण एवं मार्ग नहीं तो और क्या कह सकते है?
“भयउ विधाता वाम”
या
जाको प्रभु दारुण दुःख दीना। ताकी मति आगे हरी लीना।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 4, 2014

जाको प्रभु दारुण दुःख दीना। ताकी मति आगे हरी लीना। पंडित राय जी सुन्दर सूझ बूझ दी आप ने ..सार्थक आलेख काश लोगों के दिमाग में बात घुसे तो आनंद और आये भ्रमर ५

sanjay kumar garg के द्वारा
March 3, 2014

आदरणीय पंडित जी, सादर नमन! सत्य वचन कहे है आपने सादर आभार!


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