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नीलम वास्तव में क्या है?

Posted On: 30 Mar, 2014 ज्योतिष में

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नीलम वास्तव में क्या है?
श्री महेंद्र सारस्वत जी
===फेसबुक के अपने टाइम लाइन पर कोई कुछ लिखता है तो यह उसका अपना विचार है. अब यह आप के ऊपर निर्भर करता है आप उसे मानते है या नहीं मानते है.
मैं किसी के टाइम लाइन पर कोई टीका टिप्पड़ी नहीं कर सकता।
=====रही बात नीलम की, तो यद्यपि इसकी कई प्रजातियाँ होती है. जिसमें स्थान, देशकाल, वातावरण एवं जलवायु के अनुसार विविध पदार्थो का समावेश स्वाभाविक ही है. इसका विशद विवरण मैं जागरण जंक्शन पर प्रकाशित अपने विविध लेखो में दे चुका हूँ. किन्तु फिर भी नीलम में प्रधान रूप से कार्बन, ब्रोमिन एवं पोटाश होता है. इसके रासायनिक संयोग को बहुधा पोटैशियम ट्राई कार्बोब्रोमाइड कहा जा सकता है. इसमें 34 अणु जल के पाये जाते है. क्यूप्रिक नाइट्रेट के साथ सोडियम क्लोराइड के विलयन के संयोग से इसका नीला अवक्षेप आता है. काश्मीरी नीलम में थोड़ा सा लिन्थेनाइड भी पाया जाता है. किन्तु इसका कार्बोहाइड्रेशन इसका एन्युरोराइड बना देता है जो कार्बन का इथिकल प्रारूप है.
======अगर कोई कहता है कि इसमें एल्युमिनियम या क्रोमियम पाया जाता है तो मैं क्यों विवाद करने जाऊँ?
======= पहचान यही है कि नीले थोथे एवं सकजराव के विलयन में डालने से तत्काल नीला अवक्षेप देगा।
======= एलुमिनियम का थोड़ा भी अंश होगा तो कोई अवक्षेप नहीं प्राप्त होगा।
========दूसरी बात यह कि एलुमिनियम आवेश रहित पदार्थ है. इसका भस्मीकरण (Oxidation) इसे क्षारीय (Alkaline) बना देता है. यह शरीर के तंतुवाय को निष्क्रिय (Damage) करता है. तथा Blood Vessels के सेलुलर वाल को तोड़ता है. जिससे उग्र चर्मरोग, स्मृति क्षीणता एवं कपाल विकृति (Skull Deformity) होती है.
=======इसे किसी भी उत्कृष्ट अनद्यतन रासायनिक प्रयोगशाला (वैद्यक) से परीक्षित किया जा सकता है.
=======शनि का बुरा प्रभाव पैरो से होना माना गया है. देखें “ग्रहसिद्धांत समुच्चय”====
“प्रश्रुतं स्याद्रविजो अनर्हम तत्ताद्विमर्श शापं कृतं तत्.
कुष्ठी च शापात् यमी यमाग्रजम भवद् सपादौ नीलांजनम् खलु.।”
अर्थात परस्पर शाप के आदान प्रदान के कारण जब सूर्य का पैर कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया तब से शनि का निवास पैरो में कर दिया गया. देवताओं ने कहा कि शनि को यज्ञादि में भाग तभी सम्भव है जब सूर्य देव नैरुज्यता को प्राप्त होते है.
=====तब शनिदेव ने गूगल, कज्जल एवं भृङ्गराज का निर्माण अश्विनी कुमारो से करवाकर उसकी चिकित्सा की.
======इसी के आधार पर चरक, सुश्रुत एवं शार्ङ्गधर आदि ने कुष्टाधिकार रसायन में कुष्ठ चिकित्सा में कज्जल, गूगल एवं पारद का संयोगात्मक यौगिक अपनाया।
============इसके बावज़ूद भी यदि कोई हठपूर्वक कुछ कहता है तो मैं कुछ भी नहीं कह सकता।
======मैं इतना ही कह सकता हूँ कि एल्युमिनियम ऑक्साइड (यारद भष्म) वाला कोई यौगिक नीलम के नाम से जाना जाता है तो वह कभी भी शनि का रत्न नहीं हो सकता।
====शेष प्रयोग कर्त्ता जाने।
पण्डित आर के राय
Email-khojiduniya@gmail.com

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
March 31, 2014

आदरणीय पंडित जी, सादर नमन! शनि के बारे में सुंदर जानकारी दी है आपने, आभार!


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