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मत्स्य यन्त्रम

Posted On: 20 May, 2014 ज्योतिष में

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मत्स्य यन्त्रम
वराह पुराण की प्राचीन प्रतियों में जो कचौड़ी गली वाराणसी से प्रकाशित है, के आठवें अध्याय में क्षेपक कथा के रूप में “मत्स्यमुर्वाणियम” के नाम से मत्स्य यंत्र का वर्णन प्राप्त होता है. आचार्य देववृणु कृत “विडालक रहस्यम्” में भी इसका उल्लेख है जो आज के आधुनिक विज्ञान की अनेक मान्यताओं पर लगभग खरा उतरता है —-
“मृष्यानुवर्ज्यम् उद्त्रिखलाष्वह्यश्वानुभाति क्रमेण।
दुम्बरशमीतिक्ता आब्र्ज्यनुभाति सततं खलु अनिवारणीयम्।।”
कहते है कि मुनि मरीचि ने इसे भगवती अग्निजिह्वा को प्रसन्न कर प्राप्त किया था.
वास्तव में यह अति उच्च चुम्बकीय क्षमता से युक्त एक ताम्र पट्टिका होती है. इस पर पहले उदर्भा, प्रसारिणी पुष्प, बेलकण्टक पुष्प, अनीघा के तेल, सहदेविका का रस आदि मिश्रित कर के ताम्बे की प्लेट को घनीभूत चुम्बकीय क्षेत्र प्रदान किया जाता है. उसके बाद प्लेट के बीचोबीच पलाश, वंगभष्म, नभचाप एवं गोधूम (गेहूँ) के कज्जल में स्याही बनाकर यंत्र के खुदे हुए भाग पर पुताई कर देते हैं.
यह योग यंत्र के मध्य में विपरीत पराकर्षण का वृत्तीय परिक्षेत्र उत्पन्न करता है. क्योकि यह लेप मैग्नोलिन्थेटिक सल्फाइड एवं हाइड्रो कार्बोलेक्सिन का योग होता है. जो ताम्बा (कॉपर प्लेट) के कॉपर से रासायनिक संयोग कर क्युप्रिक डेप्थालिटेसिन फ्लोमरिक हाइड्राइड बनाता है जिसके संकेत (Signal) परिवर्द्धन एवं ऊर्जा परिवर्तन की क्षमता उच्च स्तरीय होती है. और यह शरीर के साथ ग्रहमंडल की उदासीन रश्मियों को आवर्ती ऊर्जा में बदल देता है और यह संवेदना एवं संकेत ग्राही पट्टिका के रूप में क्रियाशील हो जाता है जैसे आज का मोबाइल का SIM या Memory कार्ड काम करता है.
अंतर मात्र इतना होता है कि SIM या CHIP या मेमरी कार्ड में अवपाती किरणे संवेदना या संकेत ग्रहण करती है जो शारीरिक ग्रंथियों तंतुओं एवं कोशिकाओं के लिये घातक होती है जबकि मत्स्य यंत्र का डेप्थालिटेसिन या वृत्यानुपाती किरणे बाह्य वातावरण या ग्रहमंडल से तो संवेदना, सन्देश या ऊर्जा ग्रहण करती ही है साथ में शरीर के विविध अवयवो से विषाक्त उत्सर्जित होने वाली किरणों, सन्देश या संवेदनाओं के मूल स्वरुप “डेटोनियम फ्लूटा” की गाँठ (Clot) को गला देती है.
इस रासायनिक प्रक्रिया को “रसनिलयम्” के विकिरण प्रभाग में देखा जा सकता है.
निःसंदेह इस यंत्र का प्रभाव तीव्र, अचूक एवं ठोस होगा किन्तु मकर, कुम्भ, तुला एवं वृषभ जातक इसे नहीं धारण कर सकते है —
“सदसिचिरन्त्यवहार्यति घटतौलि वृषस्तु मृगे ननिवरहयति।
मत्स्यम द्विवन्धः न खलु अपरिहिताय द्वौपत्स्यते मारीचिकम्।।”
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
May 21, 2014

आदरणीय पंडित जी! सादर नमन! ये यंत्र किस प्रकार बनेगा, इस बारे में भी अवश्य बताइये! धन्यवाद!


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