वेद विज्ञान

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धोखेबाज ज्योतिषाचार्य

Posted On: 18 Jun, 2014 ज्योतिष में

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धोखेबाज ज्योतिषाचार्य
एक “सेलिब्रिटी” ज्योतिषाचार्य को देखें। इस ज्योतिषाचार्य ने जागरण जंकशन पर 6 सितम्बर 2012 को प्रकाशित मेरे लेख “क्या भाव या घर में बैठा ग्रह फल देता है?” पर अपनी बेवकूफी भरी टिप्पड़ी दे डाली है. आप भी थोड़ा इस लिंक पर जाकर देखें-
http://rameshkumarrai.jagranjunction.com/2012/09/06/
रेलवे बुकस्टाल से एक ज्योतिष की कोई किताब खरीद लिये, चोटी बढ़ा लिये, गेरुवा वस्त्र पहनकर लंबा तिलक लगा लिये और विविध वेबसाइट पर एक एक एकाउंट “ज्योतिष वाचस्पति, वास्तु विशारद, तंत्र विशेषज्ञ, रमलसम्राट, कर्मकाण्ड मार्तण्ड नृत्यगीत मर्मज्ञ श्री श्री 8001″ की भयंकर आकृति वाली लम्बी चौड़ी उपाधि लगाकर मूर्धन्य ज्योतिषी की भूमिका में अवतरित हो जा रहे है.
जिन्हें यह नहीं मालूम कि ज्योतिष मन्त्र-तंत्र-यंत्र नहीं बल्कि वैदिक गणित के अटल एवं ठोस सिद्धांत पर आधारित श्रमसाध्य किन्तु पूर्णविज्ञान है, वह अपनी दार्शनिक विचारधारा एवं टिप्पड़ियाँ देने का भी दुस्साहस करने लगे है.
सब ज्योतिषियों ने “लकीर का फ़कीर” बनते हुए मात्र यही परम्परा अपनाई है कि बुध शुक्र दोनों सूर्य से 48 अंशो से दूर नहीं जा सकते। और इसी के  आधार पर आज भी कुंडली बनाकर फलादेश करते हुए आम जनता को मूर्ख बनाते चले जा रहे है. जब की सौर मण्डल का ग्रहचक्रिक सिद्धान्त यह बताता है कि सौरमण्डल में वृहस्पति की सातवीं परिक्रमा पूरी होते ही बुध-शुक्र 3 अंश 15 विकला अपनी कक्ष्या में आगे निकल जाते है.
ये ज्योतिषी यह भी ध्यान नहीं देते कि विंशोत्तरी आदि महादशाओं की गणना वर्तमान समय में अश्विनी से खिसकते हुए कृत्तिका से आरम्भ हो रही है. जब कि प्रवर्तन काल में यह प्रथम नक्षत्र अश्विनी से हुआ करती थी.
और तो और, वर्तमान ज्योतिष को एक निश्चित ठोस एवं प्रामाणिक दिशा प्रदान करने वाले महामति वराहमिहिर को भी झूठा प्रमाणित करने का पुरजोर प्रयत्न किये है. जिन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी कालजयी रचना और सिद्धांत ज्योतिष के स्तम्भ स्वरुप “वृहज्जातकम्” के ‘राजयोगाध्याय” नामक ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या 20 में बताया है कि सूर्य-बुध की परस्पर दूरी 300 अंशो से भी ज्यादा हो सकती है===
“गुरुबुधसितलग्ने सप्तमस्थे अर्कपुत्रे, वियति दिवसनाथे भोगिनाम जन्म विद्यात्।
शुभबलयुतकेन्द्रैः क्रूरभस्थैश्च पापैर्व्रजति शबरदस्युस्वामिताम र्थभाक च.”
अर्थात लग्न में गुरु-बुध-शुक्र तथा सातवें शनि हो, दशवें सूर्य हो तो इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भोग भोगनेवाला, समृद्ध, धनी एवं विलासी होता है.
आप स्वयं देखें, सूर्य कैसे शुक्र-बुध से दशवें जाएगा अर्थात 300 अंशो पर जायेगा जबकि वह आज कल के ज्योतिषियों द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है की दूसरे घर से तीसरे घर तक नहीं जा सकता। इसका तात्पर्य यह कि महामति वराह लबार, मूर्ख या पोंगा पंडित थे.
===तोता रटंत पंक्तियों को रट्टा मार मार कर तथा गणित आदि करण सिद्धांत आदि के कूपमंडूक धूर्त पण्डित क्या ज्योतिष की सेवा करेगें?
==== और उलटे यह लुटेरा मुझे ही धमका बैठा।
===अपने को ज्योतिषाचार्य कहने वाले फेसबुकिया पण्डित क्या इसकी सच्चाई परखने की जहमत उठायेगें?                                 ​
विशेष- यह लेख फेसबुक पर भी उपलब्ध है. देखें-
fasebook.com/vedvigyaan
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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June 18, 2014

अनाड़ी ज्योतिषाचार्यो++++++++ नक्षत्रो की गणना अश्विनी से प्रारम्भ होती तथा रेवती पर समाप्त होती है. किन्तु वर्तमान समय में यह कृत्तिका से आरम्भ किया जाता है. देखें विंशोत्तरी दशा की गणना जो सूर्य को महादशा के लिये कृत्तिका आरूढ़ ग्रहण किया जाता है. क्या इसके कारण को जानने का प्रयत्न कभी किये हो कि ऐसा क्यों? आदि कवि बाल्मीकि ने श्री राम के जन्म के समय समस्त ग्रहो को उच्चस्थ बताया है. वर्तमान समय में सूर्य मेष एवं बुध कन्या में उच्च का माना जाता है. इस प्रकार सूर्य और बुध के बीच की दूरी 180 अंशो तक पहुँच रही है. जब कि आज मूर्द्धन्य ज्योतिषाचार्य अपनी हठवादिता का जूठन खाते हुए बुध-सूर्य के बीच 28 अंशो से ज्यादा अंतर मानने को तैयार नहीं। आखिर क्यों? क्या बाल्मीकि भी किरयाना की दुकान चलाते थे जिसमे मिलावट कर के ज्यादा कमाई करना चाहते थे? महामति वराह जिन्हें आधुनिक ज्योतिष का जनक कहा जाता है और जिनकी प्रसिद्द दोनों अमर कृतियों का अध्ययन भारत तो दूर विदेश की उच्चस्तरीय वेधशालाओं में सफलता पूर्वक किया जा रहा है उन्होंने अपने सिद्धांत ग्रन्थ “वृहज्जातकम्” के राजयोगाध्याय के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या 3 एवं 20 में यह दूरी 90 से 180 अंशो तक बताई है. तो क्या वराह मिहिर के पास “ज्योतिष सम्राट, तंत्रवाचस्पति, ज्योतिषमार्तण्ड” आदि की “डिग्री” नहीं होने से उन्होंने बार बार गलतियाँ की है? सोचो! हे ज्योतिष के कुष्ठ स्वरुप तथाकथित वर्तमान ज्योतिषाचार्यो! कुछ तो शर्म करो! थोड़ा तो गणित एवं सिद्धान्त का अध्ययन कर लो. नहीं तो आने वाली अपनी पीढ़ी के भविष्य के बारे में कुछ सोच रखा है या नहीं?

    June 18, 2014

    ऊपर मैंने श्लोक संख्या 3 एवं 20 लिखा है जो श्लोक संख्या 10 एवं 20 है. कृपया सुधारकर पढ़ें।


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