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शिवलिङ्ग, जननेन्द्रिय या कुछ और?

Posted On: 30 Jul, 2014 ज्योतिष में

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शिवलिङ्ग, जननेन्द्रिय या कुछ और?
एक विशेष सम्मति- यह लेख थोड़ा उबाऊ है. व्याकरण के क्लिष्ट सूत्रों द्वारा इसकी सिद्धि की गई है. अतः यदि आद्योपांत पढने का धैर्य एवं रूचि न हो तो मत पढ़ें। इससे आपका समय और जायका दोनों खराब होगें।
===लिङ्ग जननेन्द्रिय को ही कहते है. चाहे वह स्त्री का हो या पुरुष का. शब्द व्यञ्जना और व्याकरण की दृष्टि में====
ॡ==अंतिम स्वर है:-अ, इ, उ, ए, ओ, ँ, ः, ऋ और ॡ.
म==व्यञ्जन वर्ण का अंतिम अनुनासिक वर्ण म है. इसके बाद कोई अनुनासिक वर्ण नहीं आता है.
ग== गति, प्रयाण। क का अर्थ पानी, ख का अर्थ आकाश, ग का अर्थ गति, प्रयाण। (अमर कोश)
“यरोनुनासिके नुनासिको वा” तथा “अनुस्वारस्य ययि पर सवर्णे” सूत्रों के अनुसार म का ग से संधि होने पर अनुसार और “तवल्लकारः” से ॡकार का ॄकार लुप्त हो गया और ॡ+म+ग= लिङ्ग सिद्ध होता है.
विशेष- समस्त अनुनासिक –ञ, म, ङ्, ण, न म (माहेश्वर सूत्र) अर्थात उच्चारित होने वाले वर्ण दो प्रकार के ही है—जो कवर्ग के ग से लेकर पवर्ग के अंतिम अनुनासिक म —और शेष स्वर एवं व्यञ्जन मुँह से बोले जाने वाले। ध्यान रहे अंतःस्थ एवं ऊष्मवर्ण (य से ज्ञ पर्यन्त) इसमें समाहित नहीं है केवल म तक ही इसके अंतर्गत वर्ण आते है इसलिये ॐकार की सिद्धि इससे नहीं होती। अतः लिङ्ग को ॐकार के रूप में प्रस्तुत करना श्रद्धा एवं प्रेम की पराकाष्ठा तो हो सकती है, तथ्यगत यथार्थ या सैद्धांतिक प्रमाणीकरण से इसका कोई सम्बन्ध नहीं बनता।
अर्थात कण्ठ, मूर्द्धा, तालु, ओष्ठ, दाँत या जिह्वा तो दूर नासिका तक से उच्चरित होने वाले अंतिम वर्ण (म) के अस्तित्व में आने के लिये भी स्वर की आवश्यकता होगी ही. यह स्वर भी महत अर्थात पराकाष्ठा –अंतिम स्वर (ॡकार) लगा है.
इस प्रकार पञ्चमकार (कवर्ग का ग, चवर्ग का ञ, टवर्ग का ण, तवर्ग का न एवं पवर्ग का म –कुचुटुतुप्वाँते अनुनासिकाः) जो तत तत गुणों के अनुरूप पाँचो महत्तत्वों -शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध को धारण करते एवं लृकार आदि स्वरों से शक्ति समन्वित होकर पूर्ण (ज्ञान) को मूर्त्त रूप (जीवन) प्रदान करते है और अंत में सत्य स्वरुप जीव के (ग) गमन या प्रयाण के समय ज्ञान रुपी परम जीव में लय कर देते हैं उसे लिङ्ग कहते है.
—-अब शंका यह है कि फिर तो सबके लिंगो में यह गुण होना चाहिये? फिर अकेले शिव के क्यों?
उत्तर यह है कि जो कोई भी लिङ्ग को मात्र एक मूत्रोत्सर्ग, जननांग या व्यसन वासना का अवयव मानकर उसका प्रयोग-उपयोग करेगा उसके लिये यह पापोत्सर्जक एवं मृत्यु कारक है. और जो इसकी महत्ता को समझेगा उसके लिये परमसुख का उत्कृष्ट साधन है.
इसीलिये योगनियोग में बताया गया है कि “रसानुश्रेष्टं अपावसान्यते” अर्थात रस (वीर्य एवं रज) का धैर्य, संयम एवं बुद्धिपूर्वक संग्रह एवं नियंत्रण कभी अवसान होने ही नहीं देगा। महायोगी भीष्म पितामह की कथा से सभी परिचित है.
इसके अलावा भगवान विष्णु तो क्षीर सागर (शीतोष्ण) परिक्षेत्र में निवास करते है. ब्रह्माजी भी इसी समान पुष्प के सुखमय आसन पर बताये गये है. किन्तु भगवान शिव का निवास कैलाश जैसे हिमालय की भयङ्कर बर्फीली चोटी है.
योग की प्रारम्भिक साधारण प्रक्रिया में ब्रह्मचर्य के पालन हेतु ठन्डे जल से स्नान का निर्देश है.
अस्तु,======
लिङ्ग का तात्पर्य जीव और परमजीव के मध्य व्याप्त सकल ज्ञान का मूर्त्त रूप है. जिसे सामान्य प्राणी अज्ञानता के वशीभूत होकर मृत्यु वरन के लिये अंगीकार करता है तथा विद्वान इसका उपयोग अमरता के लिये करता है.
(यदि माता रानी की कृपा रही तो योनि के विवरण के साथ भी प्रस्तुत होऊँगा)
पारद शिवलिंग, ज्योतिष एवं आयुर्वेद से सम्बंधित अन्य विशेष जानकारी के लिये आप मेरे सम्बंधित अन्य लेख Face Book पर भी देख सकते है. Link निम्न प्रकार है-
facebook.com/vedvigyaan
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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July 30, 2014

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