वेद विज्ञान

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गोमती चक्र

Posted On: 20 Aug, 2014 ज्योतिष में

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गोमती चक्र
गोमती चक्र के सम्बन्ध में आप ने विविध उपाख्यान पढ़े होगें। जिसको जो समझ में आया उसने उस तरह से उसका रूप एवं प्रभाव बताया।
किन्तु इसमें कोई आश्चर्य नहीं है. क्योकि कल्कि पुराण में इस तरह के भ्रमजाल एवं मायावी वर्णन की अधिकता होगी, पहले ही बताया जा चुका है. –
“धर्मकञ्चुकसम्व्रीता अधर्मरुचयस्तथा।
मानुषान भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छान पार्थिव रूपिणः।।
नानाविध परिकराणि मायामोह समन्विताः।
संहरिष्यन्ति यंत्रमंत्रेण वेदशास्त्र उपन्हुताः।।
====गोमती चक्र की उत्पत्ति भगवान् विष्णु के चक्र से उस समय हुई जब देवदानव दोनों मिलकर समुद्रमन्थन करने लगे. पृथ्वी उसके भयंकर रगड़ एवं गर्जना से उत्तप्त हो गई. रोती बिलखती गाय के रूप में वह भगवान विष्णु की शरण में गयी. भगवान विष्णु ने अपने चक्र से समुद्र में ऐसी भयंकर चक्रवाती गोलाकार तरंग उत्पन्न किया कि मन्दराचल उसी में फँसकर अत्यंत तीव्र गति से पृथ्वी से ऊपर उठकर घूमने लगा. इस चक्र को ही भँवर कहा गया है. इस भँवर में फँसकर बड़े बड़े जलपोत डूब जाते है.
इस भयंकर वेग से मन्दराचल के निचले सतह से अनेक पत्थर लावा बनकर बाहर छिटकने लगे. अनेक मणियाँ, बहुमूल्य धातुएँ तथा अन्य वस्तुएं जैसे शङ्ख आदि भी छिटक कर बाहर गिरने लगे.
—-कुछ अति कीमती रत्न, पत्थर आदि घर्षण से पिघल तो गए किन्तु ऊपर पानी के सतह पर आते ही ठन्डे पड़ने लगे जो भँवर की अबाध तीव्र गति के कारण गोल रूप लेते चले गये. इनकी संख्या धीरे धीरे इतनी ज्यादा बढ़ गई कि भँवर हल्का पड़ने लगा. और अंत में समुद्रमन्थन को रोकना पड़ गया.
—-वरुण (जल) के निचले सतह-पेंदे और गो रूप धारिणी माता पृथ्वी के ऊपरी सतह के मध्यवर्ती रत्न-धातु आदि “गो मृत्तिका” या “गो मिटटी” या गोमती चक्र के नाम से जाने गये.
रहस्य विज्ञान के प्रवर्तक वरुणदेव (जल) के घर्षणमय रासायनिक संयोग के कारण इसके अंदर शक्तिशाली अतिविचित्र शक्तियों का समावेश हो गया. और “गोमाता” पृथ्वी के आशीर्वाद से इसमें धनसंम्पदा आदि प्रदान करने की शक्तियाँ भी समाविष्ट हो गईं.===देखें
“—–पुनरिह जलधि-मथनादृत-देवदानवगणमन्दरांचलानयनव्याकुलितानां सहाय्येनार्दृतचित्तः पर्वतोद्धरणामृतप्राशनरचनावतारः कूर्म्माकारः प्रसीद परेश! त्वं दीननृपाणाम्।
— तद्वोलितानि घूर्णानि दह्यमानानि खण्डानि आघूर्णित जलप्रवाहुनुकूलानि रत्नानि विपरीत क्रियार्थमवरोधाय विरूपितं गोमती चक्रानुभिशंसितानि।।”
(नारदपुराण द्वितीय अंश, तृत्तीय अध्याय, श्लोक 23.)
—–किन्तु देखने में आया है कि आजकल घोंघे की छोटी आकृति जिसमें जीव रहते है, उसे उसमें से गर्म पानी आदि की सहायता से जीव को निकालकर या मारकर साफ़ सुथरा कर गोमती चक्र के नाम से व्यवहृत किया जा रहा है. जबकि इसकी बाहरी परत सोडियम हाइड्रोफास्फाइड – एक अति उन्नत एवं परिमार्जित विषाणुघ्न का काम करती है जिसमें किसी भी जीव का होना कदापि संभव नहीं है.
—-मुझे पता नहीं उसका उल्लेख कहाँ है या इसका आधार क्या है.
गोमती चक्र एक अत्यंत शक्तिशाली उग्र रासायनिक प्रभाव वाला जल से उत्पन्न प्राकृतिक पदार्थ है जिसका नियम से और जिसके लिये उपयुक्त है वह प्रयोग करे तो अनेक विघ्न बाधा से निश्चित मुक्ति मिल सकती है.
रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, चित्रा, विशाखा एवं अनुराधा नक्षत्र में जिनका जन्म हुआ है उसके लिये गोमती चक्र किसी काम का नहीं है. कारण यह है कि इनकी कूर्म वाहिनियाँ (Ziglangic Ducts) अधोमुखी होती है. इनके क्राइनोजेनिक नंबर से इसका परिक्षण किया जा सकता है.
जिसको सिरदर्द, समलवाय, घुमरी, मृगी, मूर्छा आदि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से सम्बंधित शिकायत हो इसका प्रभिषग भष्म बनाकर प्रयोग करें तत्काल लाभ होगा।
अनावश्यक परेशानी, बार बार हार, निराशा, असफलता होने पर गाय के दूध से सम्वर्तित किसी धातु के तन्तुवाय से संयुक्त कर धारण करने से लाभ मिलता है.
बालरोगो में इसके भष्म को चाँदी के ताबीज़ में भरकर गले में बांधने से लाभ मिलता है.
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com
सम्बंधित विवरण फेसबुक पर निम्न लिंक पर उपलब्ध है–
facebook.com/vedvigyan

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