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वज्रसीस या पद्माक्षी यंत्र एवं वेद: वैज्ञानिकता एवं प्रभाव

Posted On: 20 May, 2015 ज्योतिष में

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वज्रसीस या पद्माक्षी यंत्र एवं वेद: वैज्ञानिकता एवं प्रभाव
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विवरण- सीसा (आतशी), हीरा, यशद, त्रिवंग, इन्द्रनील, सर्पमुक्ता तथा ध्रुवशीश के मूल भस्म के साथ चिपिलिका, पुनर्नवा, भटकटैया एवं अरवी के रस में मिलाकर बनाए गए तथा उन की राख से बार बार रगड़ कर चमकाए गये अम्बुज (कमल) आसीन मेरुशिखा आकृति अनुकृति भेद से —
वाँछित पति-पत्नी
स्नायुगत व्याधि निर्मूलन
कार्य में निरंतर आने वाली बाधा का निवारण तथा
मानसिक असंतुलन का निवारण
इन चारो का सम्यक काम करती है.
“सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिणSऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति.
अश्विना यज्ञंसविता सरस्वतींद्रस्य रूपं वरुणो भिषज्यन.
(यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्र 80)
इससे तीन तरह का प्रभाव उत्पन्न होता है
विकिरण के रूप में
सीसा एवं हीरा का परस्पर आवर्तित एक एक रश्मिध्रुव चुम्बकत्व के आधार पर अनावश्यक रूप से प्रविष्ट होने वाली उन समस्त किरणों को खींच खींच कर अवशोषित करते हुए उनका श्रमणा, ध्यावा, विराग एवं चिल्का रूप बनाता है जो क्रमशः तिर्यक, जह्नु, दाड़िम और ध्रुवाक्ष ग्रंथियों के घालव द्रव के अवांछित अवशेषों को उत्सर्जन नलिका से बाहर निकाल देता है.
यशद एवं त्रिवंग का ऊर्वक प्रत्यावर्तन दृग्यन्त्र (Ophthalmic System) की अधोवाहिनी के अवघूर्णन की आवृत्ति को गुणान्वित करता है. ऊर्ध्वोस्थ रज्जु (8, 9 एवं ग्यारहवी उपतान्त्रिका) एवं धारणी (Lumbar Vaccula) के उपास्ताम्बीय स्तर का निषेचन करता है.
इन्द्रनील एवं सर्पमुक्ता विकिरण कम घात एवं प्रपात ज्यादा करते है. अपने नितांत अपारदर्शी स्वभाव के कारण इनका प्रभाव स्थूल एवं अदृष्य दोनों तरह से होता है. पराभवी वाहिनियाँ इसके आगोश में सहज ही आ जाती है क्योकि इनका आभास इन्हें नहीं हो पाता है. और इस तरह कर्ण पटह के दोनों संधियों से अदृष्य त्रिशूल की रेखा सदा उत्सर्जित होती रहती है. मूर्च्छा एवं वाग्भंगिता के कारण स्वरुप कारक इसकी प्रच्छन्न क्रिया से सदा नष्ट होते रहते है.
ध्रुवशीश का विकिरण एवं संच्छादन अधोगामी होता है. इससे सुधांशु, अग्निपाषाण, हरीतिमा एवं नीरा लवण वज्र सदृश कठोर हो जाते है. संभवतः वर्तमान समय में सीमेंट की विविध प्रजातियाँ इस ध्रुवशीश के ही अंशगत मिश्रण से तैयार हो रही है.
पुनर्नवा, सगोहड़, सेहुड, पलाश एवं मंदार के आनुपातिक रस संयोग से इसका प्रभाव बदलने लगता है.
उपर्युक्त मन्त्र में मन्त्र कर्त्ता (ऋषि शँख) ने भुरिक त्रिष्टुप छन्द के माध्यम से इस मन्त्र के अंत में “भिसज्यन” शब्द का प्रयोग कर इस तथ्य को स्पष्ट कर दिया है.
प्रायः मंत्रो में इन औषधियों को कूट (Code Words) के माध्यम से सुरक्षित कर दिया गया है ताकि म्लेच्छो, आततायियों नास्तिको एवं दुराचारियो के द्वारा इनका दुरुपयोग न हो सके.
ऐसे यंत्र बहुत ही सावधानी, अध्ययन एवं परिक्षण के उपरांत तैयार किये जाने चाहिये.
यजुर्वेद में इसी अध्याय का 82वाँ मन्त्र बांझपन दूर कर पति पत्नी को संतान जन्म देने के लिये “रुद्रवर्तिनी” औषधि का निर्माण बताता है. जो उचित एवं आवश्यक समझें इसे देखें.
“तदुश्विना भिषजा रुद्रवर्तनी =========”
पण्डित आर के राय
Email- khojiduniya@gmail.com

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