वेद विज्ञान

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बेटा एवं बेटी का निरंतर कठिन होता जा रहा वैवाहिक जीवन

Posted On: 23 Jul, 2016 ज्योतिष में

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बेटा एवं बेटी का निरंतर कठिन होता जा रहा वैवाहिक जीवन—-
वर्तमान समय में आचार, धर्म एवं शिक्षा इतना दूषित हो गए हैं कि इसके परिणाम स्वरुप लड़का -लड़की या तो स्वयं या इनके माता-पिता इनके दूरगामी वैवाहिक जीवन के सुख दुःख के प्रति बिलकुल ही संज्ञा शून्य हो गए हैं तथा तब रोना एवं अन्दर अन्दर ही घुटना शुरू कर देते हैं जब इनके वैवाहिक जीवन में भयानक आग लग जाती है. यही नहीं आज लड़कियों की आत्महत्या के पीछे शतप्रतिशत यही कारण हो चुका है.
जैसा कि, मैं भारत के उस संगठन में कार्यरत हूँ जहां कोई धर्म या सम्प्रदाय नहीं होता. केवल एवं केवल राष्ट्र धर्म एवं त्याग तथा बलिदान कर्तव्य होता है. किन्तु यह तब ज़हर बनकर रह जा रहा है जब इसका परेफ या इस विचार धारा का अनुकरण सामाजिक जीवन में भी प्रारम्भ हो जाता है.
मुझे आज इस पोस्ट को लिखने का कारण ऐसे प्रसंग की संख्या का सत्रह सौ से भी पार जाना पडा है. जी हाँ, आज मुझे ऐसी ही समस्या से ग्रसित एक अति भद्र, सभ्य एवं उच्च पदाधिकारी से सामना हुआ जो बिलकुल टूट चुके हैं तथा अपनी छोटी बेटी के साथ मिले. क्योकि उनकी बड़ी बेटी अपने विवाह के आठवें महीने ही आत्महत्या कर ली थी. जो भी हो, हम इसे शास्त्र की दृष्टि से देखते हैं–
“सौरार्क्षे लग्नगे सेन्दुशुक्रे मात्रासार्द्ध बन्धकी पापदृष्टा.
कौजेSस्तांशे सौरिणा व्याधियोनिश्चारु श्रोणी वल्लभा सद्ग्रहांशे.’”
वृहज्जातक स्त्रीजातकाध्याय 22 श्लोक 10
प्रस्तुत श्लोक शालिनी छंद में लिखा गया है. अतः इसके अर्थ को विश्लेषित करते समय गणों के मात्रिक एवं अर्द्धमात्रिक आरम्भ को लेकर चलना होगा. प्रस्तुत श्लोक में कहा गया है कि मेष, वृश्चिक, मकर या कुम्भ लग्न में शुक्र एवं चन्द्रमा स्थित हों तथा उन्हें पापग्रह देखें तो स्त्री स्वयं तो व्यभिचारिणी होती ही है साथ में उसकी माता भी परपुरुषगामिनी होती है. ध्यान रहे, मेष तथा वृश्चिक दोनों मंगल की राशियाँ हैं तथा मकर एवं कुम्भ दोनों शनि की राशियाँ हैं. छंद वृत्ति के अनुसार मंगल से स्वयं एवं शनि से माता का समबन्ध है. पदबन्ध के अनुसार यदि मकर या कुम्भ के कारण कुंडली में ऐसा योग उपस्थित है तो लड़की को या लड़के को मन्त्र-मणि या औषधि की सहायता शनि की करनी चाहिये चाहे भले कुण्डली मांगलिक हो. तात्पर्य यह कि लड़की को शनि श्रावित तिलक, शनि औषधि (-दर्भ अर्थात कुश, काष्ठ हींग एवं सेमलता के बीज) से स्नान एवं लाल नीलम धारण करने से यह दोष शांत हो जाता है. आचार्य व्यालसोम ने इसकी व्यवस्था में इन उपायों के साथ शालिनेय रुद्राभिषेक भी बताया है–
“मंदास्ते तद्गृहे नपरांशे संकुलितो सप्तम जातजातः.
कुर्यादभिशेकं शालिनेय पारुशेयं तदभावः सद्धनति पुनश्च.”
दूसरे चरण में इस श्लोक में बताया है कि सप्तम राशि में मंगल का नवांश हो तथा उस पर शनि का योग या दृष्टि हो तो स्त्री को योनि व् गर्भाशय का रोग होता है. प्रस्तुत श्लोक में शब्दों का अपरवेध हो रहा है. अतः इसमें शनि या मंगल को पृथक पृथक नहीं कहा जा सकता. यदि कुडली में ऐसा योग दिखाई देता हो तो निश्चित रूप से उस लड़की का विवाह “क्रौजेSस्तांशे” अर्थात 37 वर्ष की आयु बीतने पर ही हो पायेगा. और इस प्रकार योनि सम्बन्धी जटिल व्याधि अवश्य होगी.
“ए परिवेधे ऊष्मस्य तच्छंधिः पूर्वापरौ इति.”
इसके आधार पर यदि मंगल या शनि जिसका भुक्तांश कुंडली में अधिक हो उसके निराकरण का उपाय करना चाहिये. व्यालसोम ने इसके लिये कृषला विधान बताया है. —“नैद्धर्तिरांशो वक्रे मंदे वा कृषला विधानतः.” इसका सबसे सरल उपाय है कि मंगल के तीनो अवयव- कपिला मूँगा, सरसों का पाक किया तेल तथा काकक्षी पक्षी के नख का जारित भस्म तथा शनि के तीनो अवयव- श्याम लता, अँगारू एवं लाल नीलम के भस्म को अग्नि के सहयोग अर्थात गलाकर परस्पर मिलाकर निर्मित कवच या कुंडल धारण कर लेना चाहिये.
इस श्लोक के तीसरे चरण में बताया गया है कि- सप्तम में शुभ ग्रह का नवांश हो विशेषतया शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट भी हो तो स्त्री का योनिस्तम्बभागादि सुन्दर एवं आकर्षक होता है तथा वह अपने पति का प्रिय भी होती है.
बड़ी कुशलता से आचार्य ने शब्दों के गणपात से अपने पूर्वोक्त दोनों कथनों की एक साथ संपुष्टि भी कर दी है. अर्थात यदि दोनों निवारण उपाय एक साथ कर दिये जायें जैसे कुण्डली में शुभयुति या शुभ दृष्टि यदि हो गयी हो तो मात्र मन्त्र अर्थात शनि-मंगल की अष्टका विधान से पूजन-हवन ही परम शान्ति एवं सुख का कारण बन सकती है.
ऋषि-मुनि मत तथा शास्त्र कथन तो है ही, यह मेरा अपना अनुभव रहा है कि लगभग यह निराकरण का उपाय शतप्रतिशत लाभकारी होता है.

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