वेद विज्ञान

वेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

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—ज्योतिष गणना एवं फल कथन में विचलन—-

Posted On 3 Jan, 2017 ज्योतिष में

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ज्योतिष गणना एवं फल कथन में विचलन—-
“उपदेशं पठस्येव नैवार्थज्ञोSसितत्वतः.
पाठ मात्रा हि ये विप्रा द्विपदाः पशवो हि ते.”
स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, सुतनु और नारद संवाद अध्याय 15 श्लोक 66
अर्थात वेद पुराण आदि ग्रंथों में लिखित मन्त्रों, कथनों या उपदेश का मात्र पाठ करने वाले तथा उसका अर्थ न जानने वाले या उसका रहस्य न जानने वाले ब्राह्मण होते हुए भी पशु ही हैं.
ज्योतिष में गणित एवं फलित के नियम एवं सिद्धांत जो बताये गये हैं उसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ये सारे सिद्धांत तात्कालिक ग्रह गोचर एवं प्राचीन काल में ग्रह स्थिति के अध्ययन के उपरांत पाए गये परिणाम के आधार पर सुनिश्चित किये गये है, या दुसरे शब्दों में यह सार्वकालिक नहीं हैं. तथा पुनः तात्कालिक ग्रहों के संचार एवं स्थिति एवं उसके पूर्व की स्थिति में प्राप्त स्खलन के आधार पर ये निरंतर परिवर्तन शील हैं.
“आश्लेषार्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं रवेर्धनिष्ठाद्यम.
नूनं कदाचिदासिद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु.”
वृहत्संहिता अध्याय 3 आदित्याचाराध्याय श्लोक प्रथम
अर्थात प्राचीन काल में श्लेषा नक्षत्र के आधे भाग से दक्षिणायन व धनिष्ठा के प्रारम्भ में उत्तरायण अवश्य रहा होगा, क्योकि पूर्व शास्त्रों में ऐसा कहा गया है.
अर्थात प्राचीन काल में दक्षिणायन श्लेषा नक्षत्र के आधे भाग से प्रारम्भ होता था. किन्तु आज कर्क राशि के प्रारम्भ से हो रहा है.
“साम्प्रतमयनं सवितुः कर्कटाद्यं मृगादितश्चान्यत.
उक्ताभावो विकृतिः प्रत्यक्षपरीक्षनैर्व्यक्तिः.”
वृहत्संहिता अध्याय 3 आदित्यचाराध्याय श्लोक 2
अर्थात अब आजकल कर्क राशि के प्रारम्भ में दक्षिणायन तथा मकर के आदि से उत्तरायण आरम्भ होता है. यदि भविष्य में कभी इसमें भी अंतर दिखने लगे तो प्रत्यक्ष परीक्षण-निरीक्षण विधि  (वेध दृग्गणितैक्य) द्वारा इसका निश्चय विद्वानों द्वारा किया जाना चाहिये.
इसे ही पाराशर संहिता में भी बताया गया है–
श्रविष्ठाद्यात पौष्णान्तं चरतः शिशिरः. वसन्तः पौष्णान्ताद्रोहिन्यनतम. सौम्यायात सार्पार्द्धं ग्रीष्मः. प्रावृट सार्पार्द्धाद्धस्तान्तम. चित्राद्याद इन्द्रार्द्धम शरत. हेमन्तो ज्येष्ठार्द्धाद वैष्ण्वान्तम. —-पाराशर संहिता
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किन्तु क्या किसी ने शक संवत् 1800 के बाद कभी भी यह परिक्षण कर नियम सिद्धांत में परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की है? कभी नहीं. श्रम के डर से, या अज्ञान- विद्या अभाव या पाखण्ड पूर्ण विद्वत्ता के प्रदर्शन या थोथे बकवास के कारण इन सब प्रयोग-परिक्षण या अध्ययन को छोड़ दिया तथा लकीर के फ़कीर बने एक बार जो नियम बना दिये उसी को पिटते हुए बिना यह देखे की ज्योतिष एवं उसकी गणना-फल कथन रसातल में जा रहे हैं, अपनी रोजी रोटी कमाते हुए लोगों में बहुत बड़े पंडित एवं विद्वान बने बैठे है. तथा उसमें किसी का दखल इन्हें बर्दास्त नहीं है.
कभी प्राचीन काल से दशा महादशा सूर्य के साथ अश्विनी से प्रारंभ होती थी. धीरे धीरे ज्यों ज्योज विचलन होता गया, ऋषि-मुनि आदि चिंतको विचारकों ने सिद्धांतो-नियम आदि में परिवर्तन करते हुए क्रमशः भरणी आदि में स्थिर किया पुनः उसके बाद यह गणना कृत्तिका में सिद्ध हुई. लेकिन उसके बाद न तो किसी ने इसके ऊपर विचार किया न तो इसके अध्ययन-प्रयोग आदि की आवश्यकता अनुभव की. और आज भी यह कृत्तिका में ही चली आ रही है. जब कि यदि प्रायोगिक तौर पर देखा जाय तो आज यह रोहिणी से होना चाहिये.
यही कारण है कि आज भी अभी सूर्य आज की गणना से मकर राशि में एक महीने बाद प्रवेश करने वाला है जब कि —
“नैर्दर्प्यावः परिसंधोSक्षर्लंघ्यो नविभावसौ भूयात”
अर्थात संधान कृत कक्ष्या या धनु वृत्त से ऊपर की तरफ फेंका जाता हुआ सूर्य धुंध में ही प्रवेश करता है. अर्थात धनु राशि में ही धुंध समस्त धरा को आच्छादित कर ले रहा है. —-इसके अलावा गणना से ऋतू गर्मी की आ रही है जब कि बरसात शुरू हो जाती है या गणना से बरसात होनी चाहिये जब की भयंकर गर्मी ही चल रही होती है.
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किन्तु आज कल पाश्चात्य वैज्ञानिक नियमो पर आधारित गणना विधान वाले कम्प्युटर को ही अपना सर्वस्व मान चुके आधुनिक उद्भट विद्वान पंडित समुदाय यह नहीं जानते कि कम्प्युटर मैदान में बैठकर उदय होते तथा अस्त होते सूर्य की परछाई से अयन विचलन निर्धारित नहीं करता है. उसे स्वयं करना पड़ता है—
“दूरस्थाचिन्हवेधादुदयेSस्तमयेSपि वा सहस्रांशो:.
छायाप्रवेशनिर्गमचिन्हैर्वा मंडले महति.”
वृहत्संहिता अध्याय 3 आदित्यचाराध्याय श्लोक 3.
—-यही तथ्य मैंने अपने पिछले पोस्ट में लिख दिया कि ज्योतिष में गणना विचलन एवं फलित में मिथ्या कथन आज पूरा पूरा हो गया है जिसका कारण प्राचीन ज्योतिषाचार्यों एवं मनीषियों विद्वानों आदि के कथन-निर्देश आदि की अवहेलना है, तो बहुतों को मिर्ची लग गयी.
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मैंने अपने पिछले लेखों में यह स्पष्ट किया है कि लग्न दो तरह के होते हैं- प्रथम जिससे अदृष्ट फलों का कथन किया जाय जैसे विवाह, विजय, यात्रा, जन्म तथा मृत्यु आदि का विवरण तथा दूसरा दृष्ट फलों का कथन जैसे वर्षा, बाढ़, महामारी, भूस्खलन, चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि का वर्णन किया जाय. जिसका स्पष्ट निर्देश ज्योतिष पितामह पराशर ने अपने होराशास्त्र में कर रखा है. लेकिन ====
वर्तमान ज्योतिषी आज क्या करते है?–
सीधे कम्प्युटर में डाटा भरकर कमांड दिये और एक ही लग्न से दृष्ट-अदृष्ट सब फल-भविष्यवाणी बता दिये.
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क्या अभी भी इस प्राचीन महा विद्या के जड़ खोदने तथा अपनी अज्ञानता-पाखण्ड आदि के प्रदर्शन में कोई कमी छोड़ रखी है?
–खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे—
मुझे लोग कहते हैं कि मैं पूरा ज्ञान नहीं बल्कि अधूरा ज्ञान ही देता हूँ.
भाई जी, मैं यदि पूर्ण ग्यानी होता तो आज इस नारकीय समाज में आप लोग जैसे साथियों के साथ नहीं बल्कि कही सुख चैन की जिंदगी जी रहा होता. किन्तु मेरा प्रारब्ध है कि आप जैसे चोर-उचक्के तथा देव ऋषि आदि का अपमान करने वाले साथियों के साथ भी खुश रहने का प्रयत्न कर रहा हूँ. वैसे मेरा जहां तक ज्ञान है, उसके अनुसार पूर्ण ज्ञानी एक मात्र परमेश्वर ही है, आप यदि हैं तो मैं चुनौती नहीं देता.
यह मेरे अज्ञान या अधूरा ज्ञान का ही परिणाम है. अस्तु–

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